कुणाल ने दिखाई बंगाल की असली 'पहचान'
कोलकाता। चुनावी दंगल में जहाँ अक्सर धर्म और पहचान की राजनीति चरम पर होती है, वहीं ठनठनिया काली बाड़ी से एक ऐसी सुखद तस्वीर सामने आई है जिसने नफरत के एजेंडे पर मोहब्बत का मरहम लगा दिया है। तृणमूल के उम्मीदवार कुणाल घोष और विजय उपाध्याय ने एक अनोखी रामनवमी शोभायात्रा में शिरकत की, जिसका आयोजन किसी हिंदू संगठन ने नहीं, बल्कि मोहम्मद माजिद और उनके सहयोगियों ने किया था। इस यात्रा की सबसे खास बात यह थी कि इसमें मर्यादा पुरुषोत्तम राम की भूमिका में रहीम नजर आए, तो संकटमोचन हनुमान के रूप में सलीम ने गदा थामी थी। कुणाल घोष ने इस ऐतिहासिक दृश्य पर अपनी बात ताजा टीवी से साझा करते हुए इसे असली बंगाल का चेहरा करार दिया। उन्होंने बेहद भावुक शब्दों में कहा कि धर्म जिसका-जिसका, त्योहार सबका।
घोष ने याद दिलाया कि अभी कुछ ही दिन पहले उन्होंने अपने मुस्लिम भाइयों के साथ ईद की खुशियाँ बांटी थीं और गले मिलकर सेवइयां खाई थीं। आज वही लोग रामनवमी के झंडे उठाकर जय श्रीराम के नारों के बीच भाईचारे का संदेश दे रहे हैं। उनके मुताबिक, बंगाल की मिट्टी की यही तासीर है कि यहाँ दुर्गा पूजा में मुस्लिम चंदा देते हैं और ईद के चांद का इंतजार हिंदू भाई भी शिद्दत से करते हैं। राजनीतिक गलियारों में कुणाल घोष के इस कदम को एक मास्टरस्ट्रोक के रूप में देखा जा रहा है। एक तरफ जहां विपक्षी दल ध्रुवीकरण की पिच पर बल्लेबाजी कर रहे हैं, वहीं कुणाल ने बेलघाटा के मिश्रित आबादी वाले क्षेत्र में सर्वधर्म समभाव का कार्ड खेलकर समाज के हर वर्ग को साधने की कोशिश की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राम किसी एक पार्टी की बपौती नहीं हैं, बल्कि वे पूरे देश की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। जब माजिद की अगुआई में रहीम और सलीम जैसे युवा राम और हनुमान बनकर सड़कों पर उतरे, तो बेलघाटा की जनता ने तालियों के साथ इस एकता का स्वागत किया। चुनाव के इस दौर में यह खबर एक बड़ा संदेश है कि राजनीति भले ही बांटने की कोशिश करे, लेकिन बंगाल की संस्कृति जोडऩे में विश्वास रखती है। कुणाल घोष ने इस आयोजन के जरिए यह साबित करने की कोशिश की है कि बंगाल में राम और रहीम के बीच कोई दीवार नहीं है। अब देखना यह होगा कि क्या सांप्रदायिक सौहार्द का यह संदेश ईवीएम के बटन तक पहुँच पाएगा, या चुनावी अंकगणित के आगे यह भाईचारा केवल एक प्रतीकात्मक तस्वीर बनकर रह जाएगा।